अनुशासन - एक व्यवहार परिवर्तन
अनुशासन एक व्यवहार परिवर्तन
हमें आजीवन अनुशासन में रहने की सीख दी जाती है । हर कोई इंसान जिसकी ज्ञानेन्द्रियाँ सुचारु रूप से कार्य करती हैं उसने अपने जीवन मे कई बार इस शब्द से अपने आप को रुबरु होते देखा होगा । हमारी प्रथम शिक्षक हमारी माँ से हमारे अनुशासन के प्रथम पाठ का सोपान किया जाता है । और ये अनुशासन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है । जरा सा अनुशासनहीन हुए और जीवन की गाड़ी पटरी से उतर जाती है । दरअसल अनुशासन हमारे जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए । जिसने इस अमूर्त अंग को स्वीकार कर लिया उसका जीवन सफल जिसने नहीं स्वीकारा उसके जीवन में अनेक परीक्षाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है । अनुशासन का पाठ तब आउट कठिन हो जाता है जब आप एक शिक्षक हों । एक शिक्षक के लिए एक बड़ी चुनौती हो जाती अपने बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने में । अपने बच्चों को वह कैसे बताए कि एक अनुशासित व्यक्ति आज्ञाकारी होने के साथ साथ स्व-शासित व्यवहार का स्वामी होता है । ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ और मैं अपने बच्चों को ये पाठ पढ़ाने में काफी हद तक सफल रहा । पेश है एक अनुभव ।
प्रायः हमारे जीवन में कभी-कभी ऐसे अनुभव मिलते हैं जिन्हें दूसरों से साझा करने में एक अलग आनंद की अनुभूति होती है । ऐसी ही अनुभूति आज मुझे हो रही है अपना अनुभव इस लेख के माध्यम से आप सभी के समक्ष रखने में । पिताजी को कहते सुना था पहले खुद करो फिर दूसरों को बताओ उसे करने को । और ये उनका कहना मेरे जीवन में सफल हुआ मेरे विद्यालय के बच्चों के साथ ।
नीचे एक चित्र दिया है जिसमें मैं अपने बच्चों के साथ बैठा हूँ उसी चित्र की कहानी है ये । हुआ कुछ यूं कि विद्यालय में एम डी एम के दौरान जैसे ही घंटी बजती , वैसे ही सब बच्चे लाइन में लगकर भोजन लेने के लिए तैयार हो जाते थे । हालांकि उनको लाइन में लगकर भोजन लेना पहले से ही आ गया था क्यों कि ये हमारे इंचार्ज महोदय की देन थी कि उन्होंने बच्चों को अनुशासन में रहकर मध्यान्ह भोजन लेने की आदत डलवाई । मैंने भी बच्चों को कई बार लाइन लगाने हेतु प्रेरित किया । बच्चे भोजन तो लाइन में लगकर ले लेते थे लेकिन खाना खाते समय तितर-बितर होकर खाते थे । हमारे विद्यालय में भोजन हेतु किचन शेड नहीं था । कुछ बच्चे यहां बैठे कुछ वहां बैठे कुछ लाइब्रेरी में बैठकर कहा रहे कुछ अपनी कक्षा में । कोई अकेला बैठा कहा रहा कोई अपने दोस्त के साथ , कोई अपनी सहेली के साथ । कुछ बरामदे में । मैं भी इंचार्ज जी के साथ आफिस में कुर्सी पर बैठकर भोजन करता आखिर सर जी जो ठहरे । लेकिन बच्चों का इधर उधर खाना खाना अखरता था । कई बार उनको बरामदे में खाने के लिए मैंने बोला भी लेकिन एक दो दिन से ज्यादा वो मामला चलता न था ।
एक दिन मैंने भोजन की घंटी जैसे ही बजी मैंने कुछ बच्चों को बुलाया और कहा कि आज हम भी आप लोगों के साथ भोजन बैठकर करेंगे । सभी बच्चों में खबर आग की तरह फैल गयी कि आज एस पी सर भी हम लोगों के साथ खाएंगे । मैंने भी रसोईया दीदी से बोला और मैं भी लाइन में लग गया ,खैर रसोईया दीदी नें मुझे भोजन नहीं दिया और बोलीं,"आप चलो , मैं आपका खाना लेकर आती हूँ ।"
मैंने बच्चों के साथ मिलकर चटाइयां बिछवा दी थीं । पहले दिन मैं एक कोने में बैठा । सब बच्चे बड़े अनुशासित होकर भोजन करके उठ गए । मैं भी भोजन कर के उठ गया । मैंने सोंचा मेरा काम हो गया अब तो रोज ऐसे ही खाना खाएंगे । आखिर मेरा कार्य अब हो चुका था । मैं अपने कार्य में सफल हो गया था ।
नोट : - यह मेरा स्वानुभव है ।
धन्यवाद
SP SIR KHERI
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Very useful experience sir, thx for sharing.
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